What is Internet notes in Hindi

Introduction to Internet in Hindi

कम्प्यूटर नेटवर्क के बारे में अधिक जानने के लिए देखें—Computer Networks and its Types

इंटरनेट शब्द का विस्तृत रूपInterconnected Network  होता है। यह दुनिया भर के बहुत सारे कम्प्यूटरों एवं क्म्प्यूटर नेटवर्को को जोड़कर बनाया गया कम्प्यूटरों का एक विश्वव्यापी सबसे विशाल नेटवर्क है। इसी कारण इसेनेटवर्को का नेटवर्क (Network of Networks) भी कहते है।इन्टरनेट का अविष्कार दुनिया भर के लोगो के मध्य आपसी संचार ( Communication) अर्थात् सूचनाओं एवं संदेशों के आदान-प्रदान के लिए किया गया है।

इसकी सहायता से एक व्यक्ति जिसके कम्प्यूटर पर इन्टरनेट कनेक्शन उपलब्ध है, दुनिया के किसी भी कोने में स्थित दूसरे व्यक्ति जिसके कम्प्यूटर पर भी इन्टरनेट कनेक्शन उपलब्ध है संपर्क कर सकता है और text, image, audio, video आदि के रूप में सूचनाओं एवं संदेशों का आदान-प्रदान कर सकता है। आज इन्टरनेट के माध्यम से सभी प्रकार की सूचनाओं को विश्व के किसी भी  कोने से किसी भी कोने में केवल कुछ सेकण्ड्स में ही भेजा जा सकता है। इण्टरनेट के कारण आज विश्व एक छोटे से ग्राम की भाँति बन गया है।हम घर बैठे ही पूरे विश्व की खबर रख सकते है। इसी कारण ही आज के विश्व को एक Global Village कहा जाता है तथा आज के युग को Age of Information या Age of Computers की संज्ञा दी जाती है।

What is Internet notes in Hindi

Data Communication क्या होता है इसके बारे में जानने के लिए देखें—Data Communication

WWW

WWW का पूरा नाम World Wide Web है। इसे W3या WEB भी कहा जाता है।यह इन्टरनेट का सबसे लोकप्रिय एवं सबसे बड़ा सर्विस है। इसका विकास सन् 1990 के दशक तक टीम बर्नर्स ली ने किया था। WWW   बहुत सारेवेब सर्वर्स का एक collection होता है जिसके प्रत्येक सर्वर में information load   होता है जो text, image, audio, video आदि के रूप में हो सकता है। कोई भी व्यक्ति जिसके पास इन्टरनेट कनेक्शन उपलब्ध है वह WWW से अपनी जरूरत की सूचनाओं को access करकेदेख,पढ़ तथा सुन सकता है और आवश्यकता पड़ने पर अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड भी कर सकता है।

E-Mail

E-Mail का पूरा नाम Electronic Mail होता है। यह कम्प्यूटर के द्वारा भेजी जा सकने वाली इलेक्ट्रॉनिक डाक सेवा है। यह इक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया है जिसकी सहायता से बड़ी मात्रा में सूचनाओं को प्रकाश की गति से भेजा एवं प्राप्त किया जा सकता है। इसकी सहायता से हम text, image, audio, video आदि सभी प्रकार की सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते है। E-Mail का विकास सर्वप्रथम अमेरिकी वैज्ञानिक आर.टोमलिंसन ने 1971 में किया था। आज बहुत से ऐसे कम्पनियाँ  है जो हमें इन्टरनेट पर E-Mail सेवा प्रदान करते है इनमें से Google, Yahoo, Rediff का नाम सर्वाधिक प्रचलितहै। Google कम्पनी द्वारा प्रदान किए जाने वाले E-Mail सेवा को Gmail कहा जाता है। यह एक निःशुल्क E-Mail सेवा है जिसका उपयोग दुनिया का कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इस सेवा का उपयोग करने के लिए हमें सबसे पहले www.gmail.comपर जाकर अपना एक एकाउंट बनाना पड़ता है। एकाउंट बनाने की प्रक्रिया में हम www.gmail.com द्वारा हमारे बारे मांगी गई आवश्यक सूचना जैसे— नाम, जन्मदिन, मोबाईल नम्बर, मेल/फीमेल आदि देते है तथा कम्पनी के terms एवं conditions को स्वीकार कर अपने एकाउंट के लिए username और password का निर्धारण करते है।एक बार सफलतापूर्वक एकाउंट बना लेने के बाद हम कभी भी www.gmail.com पर जाकरusername और password की सहायता सेGmail सेवा का उपयोग करते हुए निःशुल्कE-Mail   कर सकते है।

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Computer Number System notes in Hindi

Introduction to Decimal, Binary, Octal and Hexadecimal Number Systems in Hindi

कम्प्यूटर में एंट्री किए जाने वाले संख्यात्मक डेटा (Numerical Data) को दर्शाने व उस पर प्रोसेसिंग करने के लिए नम्बर सिस्टम का प्रयोग किया जाता है। संख्यात्मक डेटा के अंतर्गत टेस्ट के प्राप्तांक, रूपए-पैसे आदि आते है। हम संख्यात्मक डेटा पर गणना के लिए Decimal Number System का प्रयोग करते हैं किन्तु कम्प्यूटर Binary Number System में कार्य करता है। इसलिए कम्प्यूटर हमारे द्वारा एंट्री किए गए सभी संख्यात्मक डेटा को पहले बाईनरी में परिवर्तित करता है फिर अपने मेमोरी में स्टोर कर उस पर प्रोसेसिंग करता है। मुख्यतः नम्बर सिस्टम निम्नलिखित प्रकार के होते है—

Computer Coding System क्या होता है जानने के लिए देखें यह पोस्ट—Computer Coding Systems

  1. Decimal Number System 
  2. Binary Number System 
  3. Octal Number System
  4. Hexadecimal Number System

Decimal Number System

डेसिमल नम्बर सिस्टम हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाला नम्बर सिस्टम है। इस नम्बर सिस्टम का उपयोग गणित, व्यापार आदि सभी जगह किया जाता है। इस नम्बर सिस्टम में 0 से 9 तक के कुल दस अंको का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इस नम्बर सिस्टम का आधार 10 होता है। डेसिमल नम्बर सिस्टम में संख्या का मूल्य अंको के स्थानीय मान पर निर्भर करता है तथा अंको का स्थानीय मान ईकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार आदि के क्रम में निकाला जाता है। उदाहरण के लिए डेसिमल नम्बर (4975)10 का मूल्य निम्नलिखित प्रकार से निकालते है—

अंक                          स्थानीय मान           
 5              -            5*1=5
 7              -            7*10=70
 9              -            9*100=900
 4              -            4*1000=4000
  
 अतः संख्या = 5+70+900+4000 = (4975)10 

Binary Number System

बाईनरी नम्बर सिस्टम कम्प्यूटर में उपयोग होने वाला नम्बर सिस्टम है। इस नम्बर सिस्टम का उपयोग कम्प्यूटर अपने सभी प्रकार के प्रोसेसिंग कार्यो के लिए करता है। इस नम्बर सिस्टम में 0 व 1 केवल दो अंको का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इस नम्बर सिस्टम का आधार 2 होता है। यहाँ वास्तव में 0 व 1 कम्प्यूटर के डिजिटल सर्किट में दो वोल्टेज लेवल को दर्शाते है। 0 low voltage (0 volt) तथा 1 high voltage (5 volt) को दर्शाता है। 0 को false तथा 1 को true भी कहते है। उदाहरण के लिए बाईनरी नम्बर (10011)2 का मान दशमलव संख्या पद्धति में (19)10 होगा।

आधुनिक युग में कम्प्यूटर के विभिन्न उपयोग क्या-क्या है जानने के लिए पढ़े यह पोस्ट—Applications and Uses of Computer

Introduction to Decimal Binary Octal and Hexadecimal Number Systems in Hindi

Octal Number System

Octal Number System में 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 इन आठ अंको का प्रयोग संख्याओं को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इसीलिए इस संख्या पद्धति का आधार 8 होता है। इस नम्बर सिस्टम का विकास प्रोग्रामरो के कार्य को आसान बनाने के लिए किया गया है क्योकि इसे बाईनरी के मुकाबले सरलता से समझा जा सकता है। इसका प्रयोग कई कम्प्यूटर निर्माताओं के द्वारा हार्डवेयर और साफ्टवेयर में किया जाता है। उदाहरण के लिए संख्या (3426)8 एक Octal संख्या को निरूपित करता है जिसका दशमलव पद्धति में मान (1814)10 है।

Hexadecimal Number System

किसी नम्बर सिस्टम में संख्याओं को व्यक्त करने के लिए कितने अंको की जरूरत होती है यह उस नम्बर सिस्टम में अंको की कुल संख्या पर निर्भर करता है। अर्थात् जिस नम्बर सिस्टम में जितने कम अंक होगें संख्याओं को लिखने के लिए उतने ही अधिक अंको की जरूरत पड़ेगी। उदाहरण के लिए बाईनरी नम्बर सिस्टम में संख्याओं को व्यक्त करने के लिए डेसिमल नम्बर सिस्टम के मुकाबले अधिक अंको की जरूरत पड़ती है। इसके साथ ही बाईनरी सिस्टम को समझना थोड़ा कठीन भी होता है। अतः संख्याओं को लिखने के लिए एक और सिस्टम Hexadecimal का प्रयोग किया जाता है। Hexadecimal में संख्याओं को प्रदर्शित करने के लिए 0 से 9 तक के अंको तथा A से F तक के अक्षरों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इसमें कुल सोलह अंक होते है इसलिए इसका आधार 16 होता है। उदाहरण के लिए संख्या (5C7F)16 एक Hexadecimal संख्या को निरूपित करता है जिसका दशमलव पद्धति में मान (23679)10 है।

I-Facts (Interesting facts about Numbers Systems)

  1. Number systems को बड़े अर्थो में दो प्रकारो में विभाजित किया जाता है—Positional Number System और Non-Positional Number System
  2. Decimal, Binary, Octal और Hexadecimal ये सभी Positional Number System के अंतर्गत आते है जिसमें अंको का मूल्य उनके Position पर निर्भर करता है।
  3. Non-Positional Number System में संख्याओं को दर्शाने के लिए अंको का प्रयोग नहीं किया जाता है। इसमें एक ही चित्र या आकृति को दोहराकर अंको को निरूपित किया जाता है। इसका प्रयोग बच्चो को गिनती सीखाने के लिए किया जाता है।
  4. ऐसा कहा जाता है कि Binary Number System का विकास जर्मन गणितज्ञ Gottfried Wilhelm Leibniz ने किया था।
  5. कम्प्यूटर में Port क्या होता है और यह कितने प्रकार का होता है जानने के लिए देखें—Computer Ports and Connectors
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Computer Coding Systems: BCD ASCII EBCDIC notes in Hindi

Introduction to Various types of Computer Coding Systems: BCD ASCII EBCDIC in Hindi

कम्प्यूटर में एंट्री किए जाने वाले असंख्यात्मक (Non-Numerical) डेटा को दर्शाने व उस पर प्रोसेसिंग करने के लिए कोडिंग सिस्टम का प्रयोग किया जाता है। यहाँ असंख्यात्मक डेटा का अर्थ ऐसा डेटा से है जिस पर कोई गणितीय कार्य नहीं करना होता है जैसे— अक्षर व अक्षर से बनने वाले शब्द, नाम, मोबाईल नंबर, पता आदि। चूँकि कम्प्यूटर बाईनरी में ही कार्य कर सकता है अतः यह हमारे द्वारा एंट्री किए गए सभी असंख्यात्मक डेटा को भी पहले बाईनरी में परिवर्तित करता है। कम्प्यूटर इसके लिए किसी कोडिंग सिस्टम का प्रयोग करता है जिसमें प्रत्येक अक्षर (A-Z), अंक (0-9), व विशेष चिन्ह (+ – * / @  # & etc.) के लिए एक अद्वितीय बाईनरी कोड होता है। कुछ प्रमुख कोडिंग सिस्टम निम्नलिखित है—

Computer Number System क्या होता है और यह कितने प्रकार का होता है जानने के लिए देखें—Computer Number Systems

  1. Binary Coded Decimal (BCD)
  2. American Standard Code for Information Interchange (ASCII)
  3. Extended Binary Coded Decimal Interchange Code (EBCDIC)

Binary Coded Decimal (BCD)

बाइनरी कोडेड डेसिमल कोडिंग सिस्टम में प्रत्येक दशमलव अंक को 4 binary अंको से व्यक्त किया जाता है। इसमें प्रत्येक दशमलव अंक के लिए एक अद्वितीय 4 अंकीय बाईनरी कोड होता है। इसमें संपूर्ण Decimal Number को Binary  में बदलने की बजाय Decimal Number के प्रत्‍येक अंक को उसके चार अंकीय बाइनरी तुल्‍यांक से प्रतिस्‍थापित कर दिया जाता है। इसे 4  Bit BCD Code कहा जाता हैं। 0 से 9 तक के अंको के लिए BCD कोड निम्नलिखित है—

Coding System Binary Coded Decimal BCD Codes notes in Hindi

American Standard Code for Information Interchange (ASCII)

ASCII सबसे लोकप्रिय कोडिंग सिस्‍टम है जिसका प्रारंभ ANSI – American National Standards Institute ने 1963 में किया था। इसमें की–बोर्ड में प्रयुक्‍त प्रत्‍येक अक्षर को 7 बिट के अद्वितीय कोड से निरूपित किया जाता है। आज लगभग सभी कम्पनी के कम्प्यूटर में अक्षरों को दर्शाने के लिए ASCII कोड का ही प्रयोग किया जाता है। ASCII कोड में दो भाग होते है। इसमें left side के भाग को zone कहते है जो 3 bit का होता है तथा right side के भाग को digit कहते है जो 4 bit का होता है। वर्णमाला के अक्षरों व अंको के लिए ASCII Code निम्नलिखित है—

कम्प्यूटर का इतिहास और इसके विकास क्रम को जानने के लिए देखें—History and Development of Computer

Coding System American Standard Code for Information Interchange ASCII Codes notes in Hindi

Extended Binary Coded Decimal Interchange Code (EBCDIC)

EBCDIC कोडिंग भी ASCII के जैसे ही होता है। किन्तु इसमें अक्षरों को 8 bit के अद्वितीय बाईनरी कोड से निरूपित किया जाता है। EBCDIC कोडिंग में भी दो भाग होते है। इमसें zone और digit दोनो हो 4-4 bit के होते है। EBCDIC कोडिंग का प्रयोग मुख्यतः Mainframe और Super जैसे बड़े कम्प्यूटरों में किया जाता है।

I-Facts (Interesting facts about Coding Systems)

  1. Unicode: Universal Code एक ऐसा Coding System है जिसमें दुनिया की प्रत्येक भाषा में प्रयुक्त अक्षर के लिए एक Unique Code होता है। इसमें पहले 256 Character का कोड ASCII Code ही होता है किन्तु प्रत्येक Character को 32 Bit से निरूपित किया जाता है। यह तीन प्रकार का होता है—UTF-8, UTF-16 व UTF-32
  2. UTF-8: यह 8 Bit या 1 Byte पर आधारित Format है अर्थात् इसमें अक्षरों के लिए 8 Bit का कोड होता है।
  3. UTF-16: यह 16 Bit पर आधारित Format है। 16 Bit को 1 Word कहा जाता है।
  4. UTF-32: यह 32 Bit पर आधारित Format है। 32 Bit 2 Word के बराबर होता है।
  5. UTF – Unicode Transformation Format का संक्षिप्त रूप है।
  6. Analog, Digital और Hybrid Computer क्या होता है जानने के लिए देखें—Analog Digital and Hybrid Computer
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Computer Ports in Hindi

Physical and Virtual Ports of Computer in Hindi

कम्प्यूटर Port एक Physical Docking Point होता है जिसका प्रयोग Internal व External Devices को कम्प्यूटर से जोड़ने के लिए किया जाता है। कोई भी Device कम्प्यूटर से Cables और Ports की सहायता से ही कनेक्ट होता है। कम्प्यूटर के सारे Ports इसके Motherboard में निर्मित होते है। ये पोर्ट विभिन्न प्रकार के Internal Devices जैसे—Hard Disk Drive (HDD), Optical Disk Drive (ODD), Switch Mode Power Supply (SMPS) तथा External Devices जैसे—Mouse Keyboard, Monitor, Printer, Speaker आदि को Motherboard से कनेक्ट करते है। कम्प्यूटर के विभिन्न भागों के बारे में जानने के लिए देखें—Parts of Personal Computer (PC). कम्प्यूटर पोर्ट निम्नलिखित दो प्रकार होते है—

Physical and Virtual Ports of Computer in Hindi

Physical Ports of Computer

Physical Ports का प्रयोग किसी Device को केबल या तार के द्वारा कम्प्यूटर से जोड़ने के लिए किया जाता है। ये मुख्यतः हार्डवेयर को जोड़ने का कार्य करते है। कुछ प्रमुख Physical Ports निम्नलिखित है—

  1. USB Port:  USB पोर्ट का प्रयोग महत्वपूर्ण Devices जैसे—की-बोर्ड, माऊस, प्रिंटर, स्केनर आदि को कम्प्यूटर से कनेक्ट करने के लिए किया जाता है। USB पोर्ट की गति बहुत तीव्र होती है। इनकी गति 12 Mbps प्रति सेकण्ड की होती है।
  2. PS/2 Port: इस पोर्ट का प्रयोग पुराने की-बोर्ड और माउस को कम्प्यूटर से कनेक्ट करने के लिए किया जाता है। वर्तमान में इसके स्थान पर USB का प्रयोग किया जाता है। PS/2 Port में 6 Holes होते है। इसकी गति बहुत कम होती है।
  3. VGA Port:  इसका प्रयोग कम्प्यूटर में मदरबोर्ड और मानीटर को आपस में कनेक्ट करने के लिए किया जाता है। इसकी सहायता से ही हम कम्प्यूटर द्वारा किए जा रहे प्रोसेसिंग को मानीटर में देख पाते है। इसमें 15 Holes होते है।
  4. Serial Port: इसका प्रयोग पुराने Modem और कम्प्यूटर माउस को मदरबोर्ड से कनेक्ट करने के लिए किया जाता है। या 9 Pin व 25 Pin के दो माडल में उपलब्ध होता है। इसकी गति 115 Kilobits प्रति सेकण्ड होती है।
  5. Parallel Port: इसका प्रयोग स्केनर व प्रिंटर को कम्प्यूटर से कनेक्ट करने के लिए किया जाता है। इसमें 25 Pins का प्रयोग किया जाता है।
  6. Modem Port: इस पोर्ट का प्रयोग माडेम को कम्प्यूटर से कनेक्ट करने के लिए किया जाता है। इसे RJ11 Port भी कहा जाता है।
  7. Ethernet Port: इसका प्रयोग कम्प्यूटर को High Speed इंटरनेट नेटवर्क से कनेक्ट करने के लिए किया जाता है। इसे RJ45 Port भी कहा जाता है। यह पोर्ट ईथरनेट कार्ड पर बना होता है। इसकी गति 10-1000 Mbps तक की होती है।
  8. Power Connector: यह कम्प्यूटर के पावर केबल को SMPS से कनेक्ट करने का कार्य करता है। पावर केबल एक ओर Wall Socket व दूसरी ओर SMPS से कनेक्ट होता है। इसमें 3 Pin होते है।
  9. Sockets: इनका प्रयोग माइक्रोफोन व स्पीकर को कम्प्यूटर के Sound Card से कनेक्ट करने के लिए किया जाता है। सामान्यतः ये एक वृत्ताकार Holes होते है।

Virtual Ports of Computer

Virtual Ports का प्रयोग विभिन्न Applications के मध्य संचार स्थापित करने के लिए किया जाता है। इसकी सहायता से एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर में सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है। ये TCP/IP Networking Protocol के भाग होते है। कुछ प्रमुख Virtual Ports निम्नलिखित है—

  1. HTTP Port: HTTP Port का प्रयोग World Wide Web पर इन्टरनेट के द्वारा संचार संचार स्थापित करने के लिए किया जाता है। इसका Port Number 80 होता है।
  2. SMTP Port: SMTP Port का प्रयोग ईमेल के रुट का संचालन करने के लिए किया जाता है। इसका Port Number 25 होता है।
  3. Telnet Port: इसका प्रयोग किसी दूरस्थ कम्प्यूटर से जुड़कर उस पर कार्य करने के लिए किया जाता है। इसे Remote Login भी कहा जाता है। इसका Port Number 23 होता है।
  4. SQL Port: SQL Port का प्रयोग SQL Server से जुड़ने के लिए किया जाता है। इसका Port Number 1433 होता है।

I-Facts (Interesting facts about Physical and Virtual Ports of Computer)

  1. USB – Universal Serial Bus – वर्तमान में विभिन्न Devices जैसे—Keyboard, Mouse, Printer, Scanner आदि को कनेक्ट करने के लिए सबसे प्रचलित केबल।
  2. PS / 2 – Personal System 2 – पुराने समय में Keyboard, Mouse को कनेक्ट करने के लिए प्रचलित केबल।
  3. VGA – Video Graphics Array – मानीटर का एक Display Standard जिसका Resolution 640*480 होता है।
  4. HTTP – Hyper Text Transfer Protocol – वेबपेजों के स्थानांतरण के लिए प्रयुक्त प्रोटोकाल।
  5. SMTP – Simple Mail Transfer Protocol – ई-मेल भेजने व प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त प्रोटोकाल।
  6. Telnet – Telecommunication Network – Remote Login के लिए प्रयुक्त प्रोटोकाल।
  7. SQL – Structured Query Language – Database Management में प्रयुक्त Query Language.
  8. कम्प्यूटर के इनपुट डिवाईसों के बारे में जानने के लिए देखें—Input Devices and its Types
  9. कम्प्यूटर के आउटपुट डिवाईसों के बारे में जानने के लिए देखें—Output Devices and its Types
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Parts and Components of Personal Computer PC in Hindi

Important Parts and Components of Personal Computer PC in Hindi

Personal Computer उन कम्प्यूटरों को कहा जाता है जिसमें एक समय में सामान्यतः एक ही व्यक्ति कार्य कर सकता हैं। इनके अंतर्गत डेस्कटाप, लैपटाप, टेबलेट, स्मार्टफोन आदि आते है। Personal Computer में एक Microprocessor लगा होता है इसलिए इन्हें Micro Computer भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त इसके विभिन्न भाग निम्नलिखित होते है—

Parts and Components of Personal Computer PC in Hindi

Internal Parts and Components of PC

Computer के वे सभी Parts जो CPU Cabinet के अंदर लगे होते है Internal Parts या Internal Components कहलाते है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित Parts आते है—

Central Processing Unit (CPU)

CPU अर्थात् Central Processing Unit को System Unit भी कहते है| यह Computer का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता हैं| इससे कम्प्यूटर के सभी Devices जुड़े हुए रहते है जैसे- Keyboard, Mouse, Monitor, Printer आदि| इसे Computer का मस्तिष्क (Brain) भी कहते है| इसका मुख्य कार्य प्रोग्राम (Programs) को क्रियान्वित (Execute) करना तथा डेटा (Data) को Process करना होता है। CPU के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट देखे—Organization of Computer. CPU के निम्नलिखित तीन भाग होते है–

  1. Arithmetic and Logic Unit (ALU)
  2. Main Memory (RAM)
  3. Control Unit (CU)

Random Access Memory (RAM)

RAM कम्प्यूटर का अस्थायी व प्राथमिक मेमोरी होता हैं। हम की-बोर्ड या अन्य किसी इनपुट डिवाइस से जो कुछ भी डेटा इनुपट करते है वह सबसे पहले RAM में स्टोर होता है फिर मानीटर पर दिखाई देता है। चूँकि RAM में डेटा व प्रोग्राम अस्थायी रूप से संगृहीत होते है और कम्प्यूटर के बंद हो जाने या बिजली चले जाने डिलिट हो जाते है। इसलिए RAM को Volatile मेमोरी भी कहा जाता है। RAM के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट देखे—RAM: Random Access Memory

Hard Disk Drive (HDD)

Hard Disk कम्प्यूटर में डेटा स्टोर करने के लिए सबसे प्रचलित Secondary Storage Device है। किसी भी कम्प्यूटर में कोई और सेकेण्डरी स्टोरेज हो या न हो एक हार्ड डिस्क जरूर लगा होता है। हार्ड डिस्क में Aluminium के बने एक या एक से अधिक पतले Disk (Plate) होते है जिसमें चुंबकीय पदार्थ Iron Oxide की परत चढ़ी होती है। हार्ड डिस्क में डिस्क Track में बँटे होते है और प्रत्येक Track में भी छोटे-छोटे Sector होते है। एक Sector में 512 Byte डेटा स्टोर होता है। Disk के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट देखे—Hard Disk: Essential Secondary Storage Device

Optical Disk Drive (ODD)

Optical Disk एक चपटा, वृत्ताकार Polycorbonate डिस्क होता है। इस पर डाटा एक समतल सतह के अन्दर Pits के रूप में Store किया जाता हैं। Pits को Bumps भी कहा जाता है जो वास्तव में Optical Disk की सतह पर बने छोटे-छोटे गढ्ढ़े होते है। ये इतने छोटे होते है कि इन्हें हम अपनी आँखों से नहीं देख सकते है। Optical Disk में डेटा को प्रकाश किरण की सहायता से स्टोर किया जाता है इसीलिए इसे Optical Disk कहा जाता है। ये दो प्रकार के होते है—CD व DVD. इनके बारे में अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट देखे—Optical Disk: CD/DVD Notes in Hindi

Switch Mode Power Supply (SMPS)

SMPS एक Power Conversion यूनिट होता है जो 220V के AC को विभिन्न डिवाईसों की आवश्यकता के अनुसार DC में परिवर्तित करके उन्हें देता है। कम्प्यूटर के इलेक्ट्रानिक डिवाईसों को 5V तथा मोटर, पंखे आदि को 12V के पावर की आवश्यकता होती है।

Video Card

विडियो कार्ड को Graphics Card या Display Card के नाम से भी जाना जाता है। इसका कार्य मानीटर स्क्रीन पर आकृतियों व आउटपुट का निर्माण करना होता है। आजकल के कम्प्यूटरों में विडियो कार्ड मदरबोर्ड पर पहले से ही Inbuilt होता है।

Sound Card

साउंड कार्ड भी विडियो कार्ड की तरह ही मदरबोर्ड पर पहले से ही Inbuilt होता है। इसका कार्य माईक्रोफोन से प्राप्त Analog Signals को Digital Data में परिवर्तित करके मेमोरी में स्टोर करना होता है। साथ ही यह मेमोरी में स्टोर Digital संगीत को Analog रूप में परिवर्तित करके स्पीकर को भेजता है।

Network Interface Card (NIC)

NIC एक ऐसा Device होता है जो हमारे कम्प्यूटर को नेटवर्क से जोड़ने का कार्य करता है। यह हमारे कम्प्यूटर के मदरबोर्ड में पूर्व निर्मित होता है। कम्प्यूटर व नेटवर्क के मध्य डेटा भेजने या प्राप्त करने का कार्य NIC की सहायता से ही होता है। प्रत्येक NIC Card का एक Unique Address होता है जिसे MAC Address कहते है। NIC को Network Adapter, LAN Adapter या Physical Network Interface भी कहा जाता है।

Motherboard

मदरबोर्ड को कम्प्यूूटर को Main Board या Backbone भी कहा जाता है। यह एक तरह का Printed Circuit Board (PCB) होता है जिससे कम्प्यूटर के बाकी सभी डिवाईस प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते है। इसीलिए इसे कम्प्यूटर का ह्रदय भी कहा जाता है।

External Parts and Components of PC

Computer के वे सभी Parts जो CPU Cabinet के बाहर लगे होते है External Parts या External Components कहलाते है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित Parts आते है—

Monitor

Monitor एक Softcopy आउटपुट डिवाईस है जो स्क्रीन पर आउटपुट को प्रदर्शित करता है। इसका स्क्रीन सामान्यतः एक टी.वी. की तरह होता है जिसे Visual Display Unit (VDU) या Visual Display Terminal (VDT) भी कहा जाता है। यह हमें की-बोर्ड के द्वारा इनपुट किए जा रहे डेटा एवं प्रोसेसिंग के परिणामों को लगातार दिखाते रहता है। वर्तमान में मानीटर सर्वाधिक प्रचलित Softcopy आउटपुट डिवाइस है जिसका प्रयोग सभी कम्प्यूटर में किया जाता है। मनीटर के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट देखे—Monitor: An Essential Softcopy Output Device

Printer

Printer एक Hardcopy आउटपुट डिवाइस है जो कागज पर छापकर आउटपुट को प्रदर्शित करता है। कागज पर आउटपुट की यह प्रतिलिपि हार्डकापी कहलाता है। इस प्रकार प्रिंटर एक ऐसा आउटपुट डिवाइस है जो साफ्टकापी को हार्डकापी में परिवर्तित करता हैं।
मनीटर के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट देखे—Printer: Hardcopy Output Device

Speaker

Speaker एक Audio आउटपुट डिवाइस है। यह कम्प्यूटर के Hard Disk,  CD, DVD, Pen Drive आदि में स्टोर Audio Files जैसे—गाने या रिकार्ड की गयी आवाज आदि को हमें सुनाने का कार्य करता है। यह साउंड कार्ड से उत्पन्न विद्युत सिग्नलों को प्राप्त कर इसे ध्वनि तरंगो में बदलता है।

Mouse

माउस एक Pointing इनपुट डिवाइस है। इसका प्रयोग स्क्रीन पर प्रदर्शित Options/Tools को Select करके कम्प्यूटर को निर्देश देने के लिए किया जाता है। साथ ही इसकी सहायता से Graphics/Drawing बनाए जाते है। वर्तमान समय में माउस सबसे प्रचलित Pointing Device है। इसमें सामान्यतः तीन बटन होते है जिनकी सहायता से कम्प्यूटर को निर्देश दिये जाते है। ये तीन बटन left click, right click व scroll होते है।

Keyboard

की-बोर्ड एक टाईपिंग इनपुट डिवाईस है। इसको मुख्यतः Text, Characters व Numbers इनपुट करने के लिये डिजाइन किया गया हैं। साथ ही इसकी सहायता से Keyboard Shortcuts का प्रयोग करते हुए कम्प्यूटर को निर्देश भी दिए जा सकते है। की-बोर्ड भौतिक रूप से प्लास्टिक का आयताकार बाक्स होता है जिसमें टाइपराइटर के समान Keys बने होते है।

Scanner

Scanner एक ऐसा Input Device है जो किसी Page पर बनी आकृति या लिखित सूचना को सीधे Computer में Input करता है। इसका मुख्य लाभ यह है कि User को सूचना टाइप नहीं करनी पड़ती हैं जिससे समय की बचत होती है| इस प्रकार हम कह सकते है कि Scanning एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें Document का सीधे ही Hardcopy-to-Softcopy Conversion होता है।

Modem

Modem शब्द दो शब्दों Modulator और Demodulator से मिलकर बना है। यह एक ऐसा Device है जो Analog Signal को Digital Signal में तथा Digital Signal को Analog Signal में परिवर्तित करने का कार्य करता है।

Uninterruptible Power Supply (UPS)

UPS एक प्रकार का बैटरी होता है जो बिजली के चले जाने पर भी कम्प्यूटर को लगातार इसकी पूर्ति करते रहता है। इसका प्रयोग कम्प्यूटर को अचानक से बंद होने से बचाने व वर्तमान में किए जा रहे कार्य को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है।

Cables

Cables कम्प्यूटर सिस्टम के महत्वपूर्ण भाग होते है। इनका कार्य कम्प्यूर सिस्टम के सभी डिवाईसों को आपस में कनेक्ट करना होता है ताकि सिस्टम कार्य कर सके। इसके लिए कम्प्यूटर में विभिन्न प्रकार के केबल का प्रयोग किया जाता है जैसे—Power Cable, Display Cable, USB Cable आदि।

I-Facts (Interesting facts about Personal Computers PCs)

  1. प्रथम IBM-PC में Intel 8086 प्रोसेसर का प्रयोग किया गया था जो 8 bit का होता था। इस प्रकार के PC में स्टोरेज के लिए Floppy Disk होता था।
  2. PCXT – Personal Computer Extended Technology PC का विकसित रूप था जिसमें Intel 8088 प्रोसेसर का प्रयोग किया गया था। यह भी 8 bit का प्रोसेसर था किन्तु इस प्रकार के PC में Floppy Disk और Hard Disk दोनो लगा होता था।
  3. PCAT – Personal Computer Advanced Technology PC का और विकसित रूप था जिसमें Intel 80286 प्रोसेसर का प्रयोग किया गया था जो 16 bit का होता था। वर्तमान पीढ़ी के सभी PC को PCAT ही कहा जाता है।
  4. सभी प्रकार की नियंत्रण एवं गणनाएँ करने का कारण CPU को PC का दिमाग तथा सभी डिवाईसों को जोड़ने के कारण Motherbaord को इसका ह्रदय कहा जाता है।
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Accounting Software Tally ERP 9 notes in Hindi

What is Accounting Software Tally ERP 9 in Hindi

Accounting साफ्टवेयर ऐसा साफ्टवेयर होता है जिसकी सहायता से हम Manual किए जाने वाले अकाउंटिंग कार्य को Electronic विधि से बहुत ही आसानी से कर सकते है। सामान्यतः अकाउंटिंग का कार्य बिजनेस में होने वाले Transactions से प्रारंभ होकर विभिन्न प्रकार के रिपोर्ट बनाने तक चलता है। इस दौरान Transactions की एंट्री की जाती है तथा Trail Balance, Trading A/c, Profit & Loss A/c, Balance Sheet आदि रिपोर्ट बनाए जाते है जिससे हमें व्यापार में होने वाले लाभ-हानि का पता चलता है।

साफ्टवेयर क्या होता है इसके कितने प्रकार होते है विस्तार से जानने के लिए देखें—Software and its Types

किन्तु ये सभी कार्य Manual तरीके से करना बहुत ही कठीन होता है इसीलिए आज सभी प्रकार के बिजनेस अकाउंटिंग के लिए किसी न किसी अकाउंटिंग साफ्टवेयर का ही प्रयोग करते है। अकाउंटिंग साफ्टवेयर की मदद से अकाउंटिंग का कार्य बहुत ही आसान हो जाता है क्योंकि हमें इसमें केवल Transactions की एंट्री करनी होती है फिर बाकी सभी प्रकार के रिपोर्ट साफ्टवेयर स्वयं ही तैयार लेता है। इसका प्रयोग पूरे बिजनेस का हिसाब-किताब रखने, बिल बनाने, टैक्स व लाभ-हानि की गणना करने आदि के लिए किया जाता है। उदाहरण—Tally ERP 9

Starting Tally ERP9: Tally ERP9 को Start करने के निम्नलिखित दो प्रमुख तरीके होते है—

  1. Start -> All Programs -> Tally ERP 9
  2. Windows -> Tally -> Enter
  3. Double Click Tally ERP9 Icon on Desktop
Accounting Software Tally notes in Hindi
Fig. Tally ERP 9

I-Facts (Interesting facts about Accounting Software Tally in Hindi)

  1. Tally Accounting Software का विकास भारत की बैंगलोर स्थित कम्पनी Tally Solution Private Limited द्वारा किया गया है।
  2. Tally ERP9 टैली साफ्टवेयर का New Version है। यहाँ ERP से तात्पर्य Enterprise Resource Planningसे है। इस साफ्टवेयर का प्रयोग बड़े आकार के बिजनेस में Accounting के किया जाता है।
  3. Busy एक Business Accounting Software है जिसका विकास Busy Infotech Private Limited Delhi द्वारा किया गया है। इसका प्रयोग अधिकतर छोटे एवं मध्यम आकार के बिजनेस के लिए किया जाता है।
  4. Email Client Program क्या होता है जानने के लिए देखें—Email Client MS-Outlook
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Web Browser Software notes in Hindi

What is Web Browser Software in Hindi

Browser वे साफ्टवेयर होते है जिनकी सहायता से हम अपने कम्प्यूटर पर इंटरनेट व वेब का प्रयोग करते है। ब्राउजर के द्वारा ही हम इंटरनेट पर विभिन्न वेबसाईट एवं उनमें उपस्थित सूचना तक पहुँच पाते है। इसका प्रमुख कार्य HTML Document को पढ़ना और उसके अनुसार वेबपेज को प्रदर्शित करना होता है। प्रत्येक ब्राउजर में एक Text Field या Search Box होता है जिसमें हम उस वेबसाईट का नाम जिसे Domain Name कहते है लिखकर सर्च करते है जिसे हम खोलना चाहते है।

Email Client Software क्या होता है इसकी सहयता से ईमेल को कैसे मैनेज करते है जानने के लिए देखें—Email Client MS-Outlook

उदाहरण के लिए गूगल का वेबसाईट खोलने के लिए www.google.com लिखकर सर्च करना पड़ेगा जिससे गूगल का वेबसाईट एक ही बार में हमारे कम्प्यूटर में खुल जायेगा।  किन्तु यदि हमें वेबसाईट का पूरा नाम नहीं पता है तो उससे संबंधित Keywords लिखकर सर्च करते है जिससे लाखों-करोड़ो की संख्या में परीणाम प्राप्त होते है।

आपरेटिंग सिस्टम साफ्टवेयर क्या होता है और यह कितने प्रकार का होता है जानने के लिए देखें—OS: Operating System Software

प्रत्येक ब्राउजर वेब पर सर्च करने के लिए किसी न किसी सर्च इंजन का प्रयोग करता है जैसे कि Google Chrome एक प्रसिद्ध ब्राउजर है जिसे गूगल कंपनी ने बनाया है और इसमें सर्च करने के लिए Google Search Engine का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार Internet Explorer माइक्रोसाफ्ट कम्पनी के द्वारा बनाया गया एक प्रसिद्ध ब्राउजर है और इसमें सर्च करने के लिए Bing Search Engine का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा Mozilla FireFox, Safari, Opera आदि ब्राउजर भी बाजार में उपलब्ध है। इन सभी ब्राउजरों को Client प्रोग्राम भी कहा जाता है।

Starting a Browser: Web Browser Google Chrome को Start करने के निम्नलिखित तीन प्रमुख तरीके होते है—

  1. Start -> All Programs -> Google Chrome
  2. Windows -> Chrome -> Enter
  3. Double Click Google Chrome Icon on Desktop
Web Browser notes in Hindi
Fig. Google Chrome and Internet Explorer

I-Facts (Interesting facts about Web Browsers in Hindi)

  1. Search Engine का कार्य यूजर द्वारा Type किए गए Keywords के अनुसार Web से Webpages को सर्च करके निकालना होता है।
  2. Web Browser का कार्य इन Webpages को पढ़ना और इनमें उपलब्ध सूचनाओं को यूजर के समक्ष प्रस्तुत करना होता है।
  3. दुनिया के सबसे पहले Search Engine का नाम Archie था जिसे Alan Emtage से सन् 1990 में बनाया था।
  4. दुनिया के सबसे पहले Web Browser का नाम WorldWideWeb था जिसे Tim Berners Lee ने सन् 1990 में बनाया था। इसका नाम बदलकर बाद में Nexus रख दिया गया।
  5. World Wide Web (WWW) के अविष्कार का श्रेय भी Tim Berners Lee को ही जाता है इन्होनें ही दुनिया के सबसे पहले वेबसाइट info.cern.ch का निर्माण किया था।
  6. दुनिया का सबसे पहला Graphical User Interface (GUI) पर आधारित वेब ब्राउजर Mosaic था।
  7. कुछ प्रमुख Search Engines है— Google, Bing, Yahoo, Baidu, Altavista, AOL, Ask, Excite, Duckduckgo, Wolframalpha, Yandex, Lycos, Chacha, Mamma, Dogpile, Hotbot, Khoj etc.
  8. कुछ प्रमुख Web Browsers है— Chrome, FireFox, Edge, Internet Explorer, Safari, Opera, SeaMonkey, Maxthon, Vivaldi, GNU IceCat, Comodo Dragon, Comodo IceDragon, Chromium, Dooble, UC Browser, Netscape, Mosaic, Yandex etc.
  9. Accounting Software Tally ERP9 के बारे में जानने के लिए देखें—Accounting Software Tally ERP 9
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Utility Software Programs notes in Hindi

What are Utility Software Programs in Hindi

वे साफ्टवेयर जिनका प्रयोग कम्प्यूटर को Maintain करने, इसमें Errors का पता लगाकर इसे ठीक करने तथा इसकी Performance को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है यूटिलिटी साफ्टवेयर कहलाते है। इन्हें Service Programs भी कहा जाता है। बहुत सारे Common Utilities तो आपरेटिंग सिस्टम के साथ ही आते है जो निम्नलिखित है—

Utility Software Programs notes in Hindi

Linker और Loader क्या होते है किसी प्रोग्राम के विकास में इनकी क्या उपयोगिता होती है जानने के लिए देखें—Linker and Loader

Text Editor

Text Editor का प्रयोग Text File को बनाने के लिए किया जाता है। सामान्यतः ये टाईपिंग करने व प्रोग्राम के सोर्स कोड को लिखने के काम आते है। इनकी सहायता से हम किसी भी प्रोग्रामिंग भाषा जैसे—C, C++, HTML, CSS आदि के सोर्स कोड को लिख सकते है। Notepad एक प्रसिद्ध टैक्स्ट एडिटर है जो Windows आपरेटिंग सिस्टम के साथ आता है। इसके अलावा कुछ उन्नत टैक्स्ट एडिटर जैसे—Notepad++, Sublime Text आदि भी होते है जिनमें अलग-अलग प्रोग्रामिंग भाषाओं में कोडिंग करने के लिए बहुत से Features होते है।

File Manager

वे साफ्टवेयर जो कम्प्यूटर में फाईल और फोल्डर को मैनेज करने का कार्य करते है File Manager कहलाते है। इनका कार्य फाईल और फोल्डर बनाना तथा उनको Cut, Copy, Paste, Move आदि करने की सुविधा देना होता है। इनकी सहायता से हम कम्प्यूटर में उपस्थित फाईलों एवं फोल्डरों को देख सकते है तथा उन्हें Search व Sort भी कर सकते है। Windows Explorer एक फाईल मैनेजर है जो विन्डोज आपरेटिंग सिस्टम के साथ आता है।

System Monitor

System Monitor वे साफ्टवेयर है जो हमें हमारे कम्प्यूटर से जुड़े महत्वपूर्ण डिवाईसो जैसे—CPU, RAM, Hard Disk के वर्तमान Performance के बारे में जानकारी प्रदान करते है। उदाहरण के लिए ये बताते है कि CPU का कितना उपयोग हो रहा है, RAM या Disk में कितना स्पेस खाली है, नेटवर्क की स्थिति क्या है आदि। System Monitor हमें ये सभी जानकारी बिलकुल Real Time में प्रदान करते है। Resource Monitor एक सिस्टम मानिटर साफ्टवेयर है जो विन्डोज के साथ आता है।

Disk Cleaner

यह एक ऐसा साफ्टवेयर है जो हमारे कम्प्यूटर के हार्ड डिस्क से अनावश्यक फाईलो को डिलिट करता है। इससे कम्प्यूटर की गति और कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इसकी सहायता से हम सभी अनावश्यक फाईलो, अस्थायी फाइलो, डाउनलोड किए गए प्रोग्रामो और रिसायकल बिन की फाईलो आदि को डिलिट कर सकते है। प्रतिमाह एक बार Disk Cleaner को रन करना कम्प्यूटर के लिए अच्छा Maintenance कार्य माना जाता है। इसके लिए हम Disk Cleanup जो कि विन्डोज के साथ आया हुआ Cleaner Utility है का प्रयोग कर सकते है।

Disk Defragmenter

यह एक ऐसा साफ्टवेयर है जो हार्ड डिस्क में अलग-अलग स्थान पर स्टोर फाईल के भागों (Fragments) को एकसाथ एक स्थान पर लाता है। इससे डिस्क स्पेस की बचत होती है और कम्प्यूटर की गति व कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इस प्रकार इसका कार्य Fragments को Defragment करना होता है इसीलिए इसे Defragmenter कहा जाता है। Disk Defragmenter एक Defragmenter Utility है जो विन्डोज के साथ आता है।

Diagnostic

ये वे साफ्टवेयर है जो हमारे कम्प्यूटर में Bugs (Errors) का पता लगाकर उसे ठीक करते है। ये हार्डवेयर व साफ्टवेयर दोनो में ही Bugs का पता लगा सकते है। इनकी सहायता से कोई  साप्टवेयर ठीक से नहीं काम कर रहा हो तो उसे ठीक किया जा सकता है। साथ ही RAM, Disk में कोई गलती है तो उसका भी पता लगाकर सुधारा जा सकता है। Windows Memory Diagnostic एक Diagnostic साफ्टवेयर है जो विन्डोज के साथ आता है।

Antivirus

Antivirus वे साफ्टवेयर है जो हमारे कम्प्यूटर को वायरस से सुरक्षा प्रदान करते है। वायरस ऐसा प्रोग्राम होता है जो हमारे कम्प्यूटर को नुकसान पहुचाता है। एन्टी वायरस हमारे कम्प्यूटर में वायरस को नहीं आने देते है और यदि सिस्टम में पहले से कोई वायरस है तो उसे खोजकर समाप्त करते है। Windows Defender विन्डोस के साथ आने वाला एन्टीवायरस है। इसके अलावा आजकल मार्केट में बहुत सारे एन्टी वायरस प्रोग्राम उपलब्ध है। उदाहरण के लिए Quick Heal, Kaspersky, Norton, Avast आदि जिनकी कीमत सामान्यतः 500 से 1000 तक की होती है।

I-Facts (Interesting facts related to Utility Programs in Hindi)

  1. Compression Utility एक ऐसा प्रोग्राम होता है जो हार्ड डिस्क में स्टोर Data या Files को Compress करता है अर्थात् उन्हें छोटी आकार की Files में परिवर्तित करता है।
  2. Encryption Utility एक ऐसा प्रोग्राम है जो विशेष Algorithm का प्रयोग करते हुए Data, File, Application आदि को Encrypt करने का कार्य करता है ताकि इन्हें Unauthorized Users से बचाया जा सके।
  3. Backup Utility  एक ऐसा प्रोग्राम है जो हमारे हार्ड डिस्क में स्टोर Data या File की कापी बनाता है। इसकी सहयता से हम अपने डेटा को Disk Failure की स्थिति में होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखते है। Backup Manual व Automatic दोनो तरीको से किया जा सकता है।
  4. Synchronization Utility एक ऐसा प्रोग्राम है जो दो Data Sources के मध्य Consistency बनाए रखता है। यह एक Data Source में हुए परिवर्तन के अनुसार दूसरे Data Source को भी अपडेट करते जाता है। यह Auto Backup का ही उदाहरण है।
  5. Debugger क्या होता है किसी साफ्टवेयर के विकास में इसकी क्या भूमिका होती है जानने के लिए देखें—Debugger: A Debugging Tool
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Debugger and Debugging Tools notes in Hindi

What is Debugger and Debugging Tools in Hindi

Debugger एक ऐसा प्रोग्राम है जो किसी अन्य कम्प्यूटर प्रोग्राम में errors का पता लगाता है और उसे ठीक करता है। प्रोग्राम बनाते समय प्रोग्रामर से गलतिया हो जाती है जिन्हें bug कहा जाता है। इन bug का पता लगाकर उसे ठीक करना debug कहलाता है। और जो प्रोग्राम debug करने का कार्य करता है वह debugger कहलाता है।  इसे debugging tool भी कहा जाता है।

Linker और Loader क्या होता है इनका प्रयोग क्यो किया जाता है जानने के लिए देखें—Linker and Loader

वैसे तो हम कोई छोटा प्रोग्राम बनाते है तो उसमें गलतियों को ढूँढ़ना बहुत आसान होता है किन्तु बड़े प्रोग्राम में यह उतना आसान नहीं होता है। इसीलिए यहाँ debugger का प्रयोग किया जाता है। Debugger प्रोग्राम की जाँच करके प्रोग्रामर को बताता है कि इसके किस लाईन में क्या गलती है। साथ ही यह प्रोग्राम के लाईनों को step-by-step भी चेक कर सकता है जिससे हमें प्रोग्राम कब और कहाँ crash होता है इसका पता चल जाता है।

सामान्यतः आजकल text editor, compiler, debugger और साफ्टवेयर बनाने के लिए अन्य जरूरी tools एकसाथ आते है जिन्हें Integrated Development Environment (IDE) साफ्टवेयर कहा जाता है। CodeBlocks, Turbo C++, MS-Visual Studio, Dev C++ आदि इसके उदाहरण है।

Debugger and Debugging Tools notes in Hindi
Fig. Debugger Menu under CodeBlocks

I-Facts (Interesting facts related to Debugger and IDE Software)

  1. Code Blocks एक Free, Open Source और Cross Platform IDE है जिसे Code Block Team ने बनाया है। यह एक से अधिक Compiler को सपोर्ट करता है। उदाहरण के लिए इसमें Clang और GCC Compilers का प्रयोग किया जाता है।
  2. Turbo C++ एक Freeware IDE है जिसे सर्वप्रथम Borland Software Corporation के द्वारा बनाया गया था। यह वर्तमान में Discontinued है किन्तु इसका प्रयोग आज भी किया जाता है।
  3. Vsual Studio माईक्रोसाफ्ट के द्वारा विकसित किया गया एक एक Freemium IDE है। यह एक बहुत ही बड़ा IDE साफ्टवेयर है जिसकी सहयता से न केवल साफ्टवेयर बनाए जा सकते है बल्कि Mobile Apps और Websites भी बनाए जा सकते है।
  4. Dev C++ एक Free IDE Software है जिसका विकास सर्वप्रथम Bloodshed Software के दवारा किया गया था। इसमें MinGW तथा GCC Compilers का प्रयोग किया जाता है।
  5. Utility Software कौन – कौन से होते है और उनके क्या क्या कार्य होते है जानने के लिए देखें—Utility Software: Service Programs
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Linker and Loader notes in Hindi

Linker and Loader notes in Hindi

Compiler क्या है यह कैसे कार्य करता है जानने के लिए देखें—Compiler: A Language Translator Program

किसी छोटे कम्प्यूटर प्रोग्राम को बनाना और कम्प्यूटर पर क्रियान्वित कर वांछित आउटपुट प्राप्त करना Multiple Steps में होने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया प्रोग्राम के Source Code के लेखन से प्रारंभ होती है। इस दौरान Source Code विभिन्न चरणों जैसे— Compilation, Linking, Loading और Execution से होकर गुजरता है। Compiler का कार्य प्रोग्राम के Source Code को बाईनरी में परिवर्तित करना होता है इसके बाद Linker और Loader की बारी आती है।

Linker एक ऐसा प्रोग्राम है जो कम्पाइलर के द्वारा बनाए गए सभी आबजेक्ट को असेम्बल करके इन्हें एक executable फाईल में परिवर्तित करता है। यह प्रोग्राम के objects व libraries दोनों को लिंक करके एक executable फाईल बनाता है। Executable फाईल ही वास्तविक साफ्टवेयर होता है जिसे कम्प्यूटर समझता है और रन करता है।

Utility Programs क्या होते है इनका प्रयोग करने की आवश्यकता क्यो होती है जानने के लिए देखें—Utility Software: Service Programs

Loader एक ऐसा प्रोग्राम है जो लिंकर के द्वारा बनाए गए executable फाईल या साफ्टवेयर को रन करने के लिए कम्प्यूटर की मेमोरी में लोड करता है। लोड करते समय यह साफ्टवेयर के निर्देशों के लिए मेमोरी एड्रेस प्रदान करता है। मेमोरी में लोड होने के बाद ही प्रोसेसर साफ्टवेयर के निर्देशों को execute कर पाता है। सामान्यतः Loader आपरेटिंग सिस्टम का ही भाग होता है।

Linker and Loader notes in Hindi
Fig. Linking and Loading Process

I-Facts (Interesting facts on Linker and Loader in Hindi)

  1. लिंकर सामान्यतः दो प्रकार का होता है—Linkage Editor और Dynamic Linker.
  2. Linkage Editor एक ऐसा लिंकर होता है जो प्रोग्राम की लोडिंग से पहले Objects व Libraries को लिंक करके Relocatable या Executable File उत्पन्न करता है जबकि Dynamic Linker इसी कार्य को प्राग्राम की लोडिंग के समय Run Time में करता है।
  3. वर्तमान में Program Loading के लिए तीन Approach Absolute Loading, Relocatable Loading और Run Time Loading का प्रयोग किया जाता है।
  4. Absolute Loading में Program को सदैव एक ही मेमोरी लोकेशन में लोड किया जाता है। Relocatable Loading में प्रोग्राम के लिए Actual Address न उत्पन्न कर Relative Address उत्पन्न करता है। Dynamic Loading में प्रोग्राम के Execution के समय Run Time में इसके लिए Absolute Address उत्पन्न किया जाता है।
  5. Debugger क्या होता है इसका प्रयोग क्यो किया जाता है जाननेे के लिए देखें—Debugger: A Debugging Tool
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