Destructors Functions in C++ in Hindi

What is Destructor Function in C++ in Hindi

Constructor function क्या होता है? इसके कितने प्रकार होते है? तथा इसका क्या कार्य होता है जानने के लिए हमारा यह पोस्ट देखें—Constructor and its Types

Destructor भी constructor function की तरह ही एक special member function होता हैं। किन्तु इसका कार्य constructor से उल्टा होता हैं। Constructor का कार्य objects को initialize करना होता हैं और destructor का कार्य objects के द्वारा घेरे गए memory को free करना होता हैं। Destructor का नाम भी Constructor की तरह ही class के नाम से रखा जाता है किन्तु इसके नाम से पहले tilde (~) का निशान होता हैं। Destructor function का न तो कोई return type होता हैं और न हीं यह कोई Parameter लेता हैं। जब program का control scope के बाहर जाता हैं अर्थात् program पूरी तरह execute हो जाता हैं तो अंत में destructor function automatic call हो जाता हैं। Program में जितने object होते हैं destructor function भी उतने ही बार call होता हैं और objects के द्वारा घेरे गए memory को free कर देता हैं।

Example:

class test
{
  private:
  	int num;
  public: 
        test();
        test(int);
        ~test();    //destructor
};

Difference between Constructor and Destructor in C++ in Hindi

Constructor और Destructor में बहुत कुछ समानता है। दोनों के नामकरण व काल होना एक जैसे ही है किन्तु दोनों के कार्य एक दूसरे के विपरीत है। इन दोनों में अंतर को निम्नलिखित टेबल से समझा जा सकता है—

Difference between Constructor and Destructor in CPP in Hindi

Example program for Destructor function in C++

C++ में Function के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें—Functions in C++

#include<iostream>
using namespace std;
class test
{
    private:
        int num;
    public:
        test();
        test(int);
        ~test();    //destructor
};
test::test()
{
    num=0;
    cout<<"default constructor called"<<endl;
    cout<<"num = "<<num<<endl;
}
test::test(int a)
{
    num=a;
    cout<<"parameterized constructor called"<<endl;
    cout<<"num = "<<num<<endl;
}
test::~test()
{
    cout<<"destructor called"<<endl;
}
int main()
{
    test t1;
    test t2(10);
    return 0;
}

Output:

default constructor called
num = 0
parameterized constructor called
num = 10
destructor called
destructor called

Friend function क्या होता है जानने के लिए इस पोस्ट को देखें—Friend Function in C++

Share it to:

Constructor function and Its Types in C++ in Hindi

Introduction to Constructors in C++ in Hindi

C++ में function क्या होता है यह कैसे कार्य करता है जानने के लिए देखें हमारा यह पोस्ट—Functions in C++

Constructor एक special member function होता है, जिसका प्रयोग class के objects को initialize करने के लिए किया जाता हैं। constructor function का नाम class के नाम से रखा जाता हैं अर्थात् class का जो नाम होता है वही नाम constructor function का भी होता है। जब हम main() function में उस class का object बनाते हैं तो constructor function automatic call हो जाता हैं और उस object के members को initialize कर देता हैं।

Example:

Constructors and Its Types in C++ in Hindi

Types of Constructor Function in C++ in Hindi

C++ में निम्नलिखित चार प्रकार के Constructor Function होते है—

  1. Default constructor
  2. Parameterized constructor
  3. Copy Constructor
  4. Dynamic Constructor

Default Constructor

Default Constructor सबसे सामान्य प्रकार होता हैं। इसका प्रयोग objects को एक fix value से initialize करने के लिए किया जाता है।

Parameterized constructor

Parameterized Constructor ऐसा Constructor होता हैं, जिसकी सहायता से हम Parameter pass करके object को initialize कर सकते हैं।

Copy Constructor

Copy Constructor का प्रयोग एक object को दूसरे object से initialize करने के लिए किया जाता है। इसमें एक object की value को दूसरे object में copy किया जाता हैं।

Dynamic Constructor

Dynamic Constructor का प्रयोग Dynamic memory allocation में किया जाता है। इसकी सहायता से objects को Run time में बनाया जाता हैं। इसे Dynamic Creation of Object कहा जाता हैं।

Characteristics of Constructor Function in C++ in Hindi

  1. इसे हमेशा class के public section में declare किया जाता हैं।
  2. इन्हें अलग से call करने की जरूरत नहीं पड़ती है। जब उस class का object बनता है, तो यह automatic ही call हो जाता हैं।
  3. इसका कोई return type नहीं होता है अर्थात् यह कोई value return नहीं करता हैं।
  4. इनको inherit नहीं किया जा सकता हैं।
  5. Constructor function virtual नहीं हो सकता हैं।
  6. Constructor function को point नहीं किया जा सकता हैं।

Example Program for Default Constructor in C++

#include<iostream>
using namespace std;
class test
{
    private:
        int num;
    public:
        test(); //default constructor
};
test::test()
{
    num=100;
    cout<<"Default constructor called"<<endl;
    cout<<"num = "<<num;
}
int main()
{
    test t;
    return 0;
}

Output:

Default constructor called
num = 100

C++ में Class और Objects के बारे में अधिक जानने के लिए देखें—Class and Object

Share it to:

Friend function in C++ in Hindi

What is friend function in C++ in Hindi

हम जानते हैं कि OOPs को किसी एक class के private member के द्वारा ही access किया जा सकता हैं। किसी दूसरे class के member function private data को access नहीं कर सकते हैं किन्तु कई बार program बनाते समय ऐसी आवश्यकता होती है कि दूसरे class के function class के private data को access करे। ऐसा करने के लिए एक class के member function को किसी दूसरे class का friend function declare करना पड़ता हैं।

C++ में function क्या होता है अधिक जानने के लिए देखें—Functions in C++

इसके लिए C++ में friend keyword का प्रयोग किया जाता हैं। जब हम एक class के member function को friend keyword का प्रयोग कर दूसरे class का friend function बनाते हैं, तो इसको दूसरे class के private member को access करने का अधिकार मिल जाता हैं। किन्तु friend function private members को सीधे- सीधे access नहीं कर सकता है इसके लिए उसको उस class के object का प्रयोग करना पड़ता हैं।

Friend function in C++ in Hindi

Characteristics of friend function in C++ in Hindi

  1. Friend function उस class का member नहीं होता जिसमें इसे friend declare किया जाता हैं।
  2. चूंकि यह class का member नहीं होता इसलिए इसे उस class के object के द्वारा call भी नहीं किया जा सकता है।
  3. इसे बिना किसी object के किसी normal function की तरह call किया जा सकता हैं।
  4. यह class के private member को member function की तरह सीधे-सीधे use नहीं कर सकता हैं। इसके लिए यह उस class के object का प्रयोग करता हैं।
  5. इसे class के public व private दोनों ही section में प्रयोग किया जा सकता हैं।
  6. सामान्यतः friend function  में object को argument के रूप में pass किया जाता हैं।

C++ में this pointer क्या है जानने के लिए देखें—This pointer in C++

Example program for friend function in C++

#include<iostream>
using namespace std;
class A;
class B
{
    private:
        int r, s, res;
    public:
        void sum(A);
};
class A
{
    private:
        int p, q, res;
    public:
        friend void B::sum(A);
};
void B::sum(A a)
{
    cout<<"Enter p: ";
    cin>>a.p;
    cout<<"Enter q: ";
    cin>>a.q;
    a.res=a.p+a.q;
    cout<<"sum p+q = "<<a.res<<endl;
    cout<<"Enter r: ";
    cin>>r;
    cout<<"Enter s: ";
    cin>>s;
    res=r+s;
    cout<<"sum r+s = "<<res<<endl;
}
int main()
{
    A a1;
    B b1;
    b1.sum(a1);
    return 0;
}

Output:

Enter p: 2
Enter q: 3
sum p+q = 5

Enter r: 4
Enter s: 1
sum r+s = 5
Share it to:

What is Internet notes in Hindi

Introduction to Internet in Hindi

कम्प्यूटर नेटवर्क के बारे में अधिक जानने के लिए देखें—Computer Networks and its Types

इंटरनेट शब्द का विस्तृत रूपInterconnected Network  होता है। यह दुनिया भर के बहुत सारे कम्प्यूटरों एवं क्म्प्यूटर नेटवर्को को जोड़कर बनाया गया कम्प्यूटरों का एक विश्वव्यापी सबसे विशाल नेटवर्क है। इसी कारण इसेनेटवर्को का नेटवर्क (Network of Networks) भी कहते है।इन्टरनेट का अविष्कार दुनिया भर के लोगो के मध्य आपसी संचार ( Communication) अर्थात् सूचनाओं एवं संदेशों के आदान-प्रदान के लिए किया गया है।

इसकी सहायता से एक व्यक्ति जिसके कम्प्यूटर पर इन्टरनेट कनेक्शन उपलब्ध है, दुनिया के किसी भी कोने में स्थित दूसरे व्यक्ति जिसके कम्प्यूटर पर भी इन्टरनेट कनेक्शन उपलब्ध है संपर्क कर सकता है और text, image, audio, video आदि के रूप में सूचनाओं एवं संदेशों का आदान-प्रदान कर सकता है। आज इन्टरनेट के माध्यम से सभी प्रकार की सूचनाओं को विश्व के किसी भी  कोने से किसी भी कोने में केवल कुछ सेकण्ड्स में ही भेजा जा सकता है। इण्टरनेट के कारण आज विश्व एक छोटे से ग्राम की भाँति बन गया है।हम घर बैठे ही पूरे विश्व की खबर रख सकते है। इसी कारण ही आज के विश्व को एक Global Village कहा जाता है तथा आज के युग को Age of Information या Age of Computers की संज्ञा दी जाती है।

What is Internet notes in Hindi

Data Communication क्या होता है इसके बारे में जानने के लिए देखें—Data Communication

WWW

WWW का पूरा नाम World Wide Web है। इसे W3या WEB भी कहा जाता है।यह इन्टरनेट का सबसे लोकप्रिय एवं सबसे बड़ा सर्विस है। इसका विकास सन् 1990 के दशक तक टीम बर्नर्स ली ने किया था। WWW   बहुत सारेवेब सर्वर्स का एक collection होता है जिसके प्रत्येक सर्वर में information load   होता है जो text, image, audio, video आदि के रूप में हो सकता है। कोई भी व्यक्ति जिसके पास इन्टरनेट कनेक्शन उपलब्ध है वह WWW से अपनी जरूरत की सूचनाओं को access करकेदेख,पढ़ तथा सुन सकता है और आवश्यकता पड़ने पर अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड भी कर सकता है।

E-Mail

E-Mail का पूरा नाम Electronic Mail होता है। यह कम्प्यूटर के द्वारा भेजी जा सकने वाली इलेक्ट्रॉनिक डाक सेवा है। यह इक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया है जिसकी सहायता से बड़ी मात्रा में सूचनाओं को प्रकाश की गति से भेजा एवं प्राप्त किया जा सकता है। इसकी सहायता से हम text, image, audio, video आदि सभी प्रकार की सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते है। E-Mail का विकास सर्वप्रथम अमेरिकी वैज्ञानिक आर.टोमलिंसन ने 1971 में किया था। आज बहुत से ऐसे कम्पनियाँ  है जो हमें इन्टरनेट पर E-Mail सेवा प्रदान करते है इनमें से Google, Yahoo, Rediff का नाम सर्वाधिक प्रचलितहै। Google कम्पनी द्वारा प्रदान किए जाने वाले E-Mail सेवा को Gmail कहा जाता है। यह एक निःशुल्क E-Mail सेवा है जिसका उपयोग दुनिया का कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इस सेवा का उपयोग करने के लिए हमें सबसे पहले www.gmail.comपर जाकर अपना एक एकाउंट बनाना पड़ता है। एकाउंट बनाने की प्रक्रिया में हम www.gmail.com द्वारा हमारे बारे मांगी गई आवश्यक सूचना जैसे— नाम, जन्मदिन, मोबाईल नम्बर, मेल/फीमेल आदि देते है तथा कम्पनी के terms एवं conditions को स्वीकार कर अपने एकाउंट के लिए username और password का निर्धारण करते है।एक बार सफलतापूर्वक एकाउंट बना लेने के बाद हम कभी भी www.gmail.com पर जाकरusername और password की सहायता सेGmail सेवा का उपयोग करते हुए निःशुल्कE-Mail   कर सकते है।

Share it to:

Array of objects in C++ in Hindi

Explain Array of objects in C++ in Hindi

जिस प्रकार Structure का प्रयोग करके Structure का Array या Array of Structures बनाया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार हम Objects का Array या Array of Objects भी बना सकते है। इस प्रकार यदि Integers का Array हो सकता है तो Structures का Array भी हो सकता है और Structures का Array हो सकता है तो Classes का भी Array हो सकता है। Classes के Array को ही Array of Objects कहा जाता है। इसमें सारे Objects मेमोरी में किसी Multidimensional Array की तरह Contiguous Locations में अर्थात् एक के बाद एक स्टोर होते है।

Object Oriented Programming (OOPs) की महत्वपूर्ण अवधारणाओं जैसे— Class, Object, Inheritance, Polymorphism आदि के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए हमारा यह पोस्ट देखें—Concepts of OOP

Array of Objects बनाना बहुत ही आसान होता है। इसे किसी सामान्य Integer Array की तरह ही Declare किया जा सकता है। इसे Declare करते समय पहले Class का नाम फिर Object का नाम फिर Subscript Operator के अंदर Array का Size देते है तथा प्रोग्राम में प्रत्येक Object को Access करने के लिए Dot Operator और Array के Index का प्रयोग करते है। यहाँ भी Index 0 से प्रारंभ होता है और Object को सूचित करता है। इसका Declaration Syntax और Example निम्नलिखित है—

Explain Array of objects in C++ in Hindi

Example program for Array of objects in C++

#include<iostream>
using namespace std;
class student
{
private:
    char name[10];
    int marks;
    float percent;
public:
    void getdata(void);
    void putdata(void);
};
void student::getdata(void)
{
    cout<<"Enter name: ";
    cin>>name;
    cout<<"Enter marks: ";
    cin>>marks;
    cout<<"Enter percent: ";
    cin>>percent;
}
void student::putdata(void)
{
    cout<<"Name: "<<name<<endl;
    cout<<"Marks: "<<marks<<endl;
    cout<<"Percent: "<<percent<<endl;
}
int main()
{
    student s[3];
    int i;
    cout<<"Enter data of students:"<<endl;
    cout<<"_______________________"<<endl;
    for(i=0;i<3;i++)
    {
        s[i].getdata();
        cout<<endl;
    }
    cout<<"Entered data are:"<<endl;
    cout<<"________________________"<<endl;
    for(i=0;i<3;i++)
    {
        s[i].putdata();
        cout<<endl;
    }
    return 0;
}

Output:

Array of objects in C++ program output

C++ Language एवं इसके इतिहास के बारे में अधिक जानने के लिए हमारा यह पोस्ट देखें—Brief Introduction of C++

Share it to:

System Files of MS DOS in Hindi

What are Some Important System Files of MS DOS in Hindi

MS-DOS के बारे में अधिक जानने के लिए देखें—Microsoft Disk Operating System (MS DOS)

Microsoft Disk Operating System (MS DOS) एक आपरेटिंग सिस्टम साप्टवेयर है इसका निर्माण बहुत सारे Files या Programs से मिलकर हुआ है जिन्हें System Files कहते है। अलग-अलग सिस्टम फाईलें सिस्टम से संबंधित अलग-अलग जरूरतो को पूरा करती है। MS DOS की कुछ महत्वपूर्ण सिस्टम फाइलें निम्नलिखित है—

System Files of MS DOS in Hindi

IO.SYS and MSDOS.SYS

इन दोनों फाईलो का कार्य कम्प्यूटर सिस्टम में Input/Output Devices और Operating System के मध्य संपर्क स्थापित करना होता है। ये दोनों Hidden Files होती है जो बूटिंग के दौरान स्वतः मेमोरी में लोड हो जाती है। इन्हें DOS Kernel भी कहा जाता है।

COMMAND.COM

यह फाईल User और Computer के मध्य संपर्क स्थापित करता है। इसमें MS DOS के विभिन्न Internal Commamds स्टोर होते है जिन्हें हम DOS Prompt पर क्रियान्वित कर सकते है। यह भी बूटिंग के दौरान स्वतः ही मेमोरी में लोड हो जाता है। इसे Command Interpreter, Console Command Processor या Shell भी कहा जाता है।

AUTOEXEC.BAT

AUTOEXEC.BAT एक Batch File है जिसमें लिखे Commands बूटिंग के दौरान स्वतः क्रियान्वित हो जाता है। इसीलिए इस File का नाम AUTOEXEC अर्थात् Auto Executable रखा गया है। इसमें DOS के लिए प्रारंभिक निर्देश DOS Commands के रूप में होते है।

CONFIG.SYS

यह एक ऐसा फाईल है जिसमें कम्प्यूटर से जुड़े विभिन्न हार्डवेयरों जैसे—Keyboard, Mouse, Printer, Memory आदि का Configuration (Setting) स्टोर रहता है। इसका उपयोग DOS और अन्य Applications के द्वारा किया जाता है। CONFIG.SYS फाईल AUTOEXEC.BAT फाईल के बाद क्रियान्वित होता है। यह कम्प्यूटर के Root Directory में स्टोर होता है।

I-Facts (Interesting facts about MS DOS System Files in Hindi)

  1. MS-DOS में बूटिंग पूरा होने पर जो स्क्रीन में दिखाई देता है उसे DOS Prompt या System Prompt कहते है। यह पहले A:\> के रूप में दिखता था किन्तु अब C:\> के रूप में दिखाई देता है।
  2. DOS में दो तरह की फाईलें होती है—Data File और Program File. डेटा फाईल डेटा या सूचनाओं का संग्रह होता है जबकि प्रोग्राम फाईल निर्देशों का संग्रह होता है।
  3. DOS में फाईल का नाम दो भागों से मिलकर बना होता है—Primary Name और Extension Name. प्रायमरी नाम 8 अक्षरों का होता है जबकि एक्सटेंशन नाम 3 अक्षरों का होता है। इन दोनों नामों के मध्य Dot ( . ) का प्रयोग किया जाता है।
  4. DOS में Folder को Directory कहा जाता है। Directory फाईलों का संग्रह होता है। इसे हार्ड डिस्क के एक Named Section के रूप में परिभाषित किया जाता है।
  5. Windows आपरेटिंग सिस्टम के बारे में जानने के लिए देखें—Introduction to MS-Windows
Share it to:

MS DOS Booting Process notes in Hindi

Explain Booting Process of MS DOS in Hindi

कम्प्यूटर को Start एवं Restart करना Booting कहलाता है। बंद पड़े कम्प्यूटर को स्टार्ट करना Cold Booting तथा पहले से चालू कम्प्यूटर को रिस्टार्ट करना Warm Booting कहलाता है। जब हम कम्प्यूटर का पावर बटन आन करते है तो ROM Memory में स्टोर प्रोग्राम BIOS (Basic Input Output System) अपने आप Execute (Run) हो जाता है। यह प्रोग्राम सभी Devices को Check करता है जिसे POST (Power On Self Test) कहते है।

MS-DOS आपरेटिंग सिस्टम के बारे में अधिक जानने के लिए देखें—Microsoft Disk Operating System (MS DOS)

यदि सभी डिवाईस ठीक तरह से कार्य कर रहे होते है तो यह  MS-DOS को External Storage Device (Hard Disk) से Internal Memory Device (RAM) में लोड करता है। इस प्रक्रिया को Booting Process कहा जाता है। सफलातापूर्वक Booting हो जाने के बाद हमें DOS Command Prompt ( C:\> ) दिखायी देता है और हमारा कम्प्यूटर कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है। MS-DOS के Booting Process को निम्नलिखित Steps से समझा जा सकता है—

  1. BIOS Initialization: इस चरण में BIOS Firmware कम्प्यूटर सिस्टम से जुड़े हार्डवेयर डिवाइसों की पहचान करता है और उन्हें प्रारंभ करता है।
  2. POST: इस चरण में BIOS आपरेटिंग सिस्टम के लोडिंग के लिए Disk की पहचान करता है तथा Boot Sector में स्थित MBR को पढ़ता है।
  3. MBR Program Data Area में स्टोर दो फाईलों IO.SYS व MSDOS.SYS को ढूँढ़कर इसे मेमोरी में लोड करता है इसके बाद कम्प्यूटर के द्वारा CONFIG.SYS फाईल को लोड किया जाता है।
  4. Booting के अंतिम चरण में COMMAND.COM नामक फाईल को मेमोरी में लोड किया जाता है जिसमें DOS के सभी Internal Commands स्टोर होते है। इसके बाद AUTOEXEC.BAT फाईल स्वतः ही Execute हो जाता है और हमारा कम्प्यूटर पूरी तरह से चालू हो जाता है।
Booting Process notes in Hindi
Fig. Booting Process

I-Facts (Interesting facts related to MS DOS Booting Process in Hindi)

  1. POST – Power On Self Test, BIOS – Basic Input Output System, MBR – Master Boot Records
  2. Boot Sequence: यह उन Operations का समूह होता है जिन्हें कम्प्यूटर तब Perform करता है जब कम्प्यूटर स्टार्ट होता है।
  3. Bootstrap Loader: यह आपरेटिंग सिस्टम को स्टार्ट करने के लिए आवश्यक अन्य साफ्टवेयर को मेमोरी में लोड करता है।
  4. Master Boot Record (MBR): Hard Disk के सबसे पहले Sector में स्टोर सूचना होता है जो बताता है कि आपरेटिंग सिस्टम डिस्क में कहाँ स्थित है और इसे किस तरह मेमोरी में लोड किया जा सकता है। Master Boot Record को Master Partition Table भी कहा जाता है।
  5. Warm Reboot के लिए Keyboard Shortcut Ctrl+Alt+Del का प्रयोग किया जाता है।
  6. Cold Booting में कम्प्यूटर के हार्डवेयर पार्ट्स ठंडे होते है जबकि Warm Booting में कम्प्यूटर पहले से ही चालू होता है अतः इसके हार्डवेयर पार्ट्स गरम होते है इसीलिए इसका नाम Warm Booting है।
  7. आपरेटिंग सिस्टम क्या होता है इसके बारे में अधिक जानने के लिए देखें—OS: Operating System Software
Share it to:

Microsoft Disk Operating System MS DOS notes in Hindi

What is MS DOS in Hindi

MS-Windows क्या होता है Windows और DOS में क्या अंतर होता है जानने के लिए देखें—Introduction to MS-Windows

Microsoft Disk Operating System (MS-DOS) एक आपरेटिंग सिस्टम साफ्टवेयर है Microsoft कम्पनी के द्वारा बनाया गया है। यह CLI अर्थात् Command Line Interface पर आधारित आपरेटिंग सिस्टम साफ्टवेयर है जिसमें सारे कार्य Keyboard से Command Type करके किया जाता है। इसे Disk Operating System इसलिए कहा जाता है क्योकिं यह कम्प्यूटर के Hard Disk को नियंत्रित करता है और अधिकतर Disk से संबंधित Input/Output का कार्य करता है। MS-DOS हमारे Hard Disk को मुख्यतः निम्नलिखित दो भागों में विभाजित करता है—System Area और Data Area.

Microsoft Disk Operating System MS DOS notes in Hindi

System Area वह भाग होता है जिसमें हमारे डिस्क के नियंत्रण से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाएँ होती है तथा Data Area वह भाग होता है जहाँ यूजर का डेटा स्टोर होता है। System Area आगे तीन भागों Boot Record, File Allocation Table (FAT) व Root Directory में विभाजित होता है। Boot Record Disk का सबसे पहला भाग होता है जहा DOS को चालू करने सें संबंधित जानकारी स्टोर होता है। File Allocation Table (FAT) में हार्ड डिस्क के Data Area को नियंत्रण करने से संबंधित जानकारी संग्रहीत रहता है। Root Directory कम्प्यूटर सिस्टम का सबसे प्रमुख File Directory होता है जिसे Backslash ( \ ) से सूचित किया जाता है।

I-Facts (Interesting facts related to MS DOS in Hindi)

  1. Interface के आधार पर Operating System मुख्यतः दो प्रकार के होते है—CLI और GUI.
  2. CLI – Command Line Interface आपरेटिंग सिस्टम में सारे कार्य Keyboard से Command Type करके किया जाता है।
  3. GUI – Graphical User Interface आपरेटिंग सिस्टम में कार्य करने के लिए Graphics और Mouse का प्रयोग किया जाता है।
  4. DOS को CUI (Character User Interface) आपरेटिंग सिस्टम भी कहा जाता है।
  5. Microsoft से पहले International Business Machines (IBM) ने Personal Computer Disk Operating System (PC-DOS) नाम से सन् 1981 में एक आपरेटिंग सिस्टम बनाया था।
  6. MS-DOS का पहले Version सन् 1981 में रिलिज किया गया था जिसका नाम MS-DOS 1.0 था। इसका अंतिम Version MS-DOS 6.22 था जिसे सन् 1994 में रिलिज किया गया था। इसके बाद से DOS को Windows के साथ Accessories में Command Prompt के नाम से जोड़ दिया गया।
Share it to:

Access Specifiers Modifiers or Visibility Levels in C++ in Hindi

What are Access Specifiers or Visibility Levels in C++ in Hindi

C++ में Class और Object क्या होता है इनका प्रोग्राम कैसे लिखते है जानने के लिए देखें—Class and Object

C++ में Access specifiers का प्रयोग class के members के लिए access permission निर्धारित करने के लिए किया जाता हैं। इसमें private, public व protected ये तीन तरह के access modifier होते हैं। इन तीनों keywords का प्रयोग करके ही हम class के members को private, public व protected declare करते है। इस प्रकार access specifier यह निर्धारित करते हैं कि class के members को किसी बाहरी function के द्वारा access किया जा सकता हैं कि नहीं। Access specifiers को access modifiers या visibility levels भी कहा जाता हैं।

  1. Private access specifier
  2. Protected access specifier
  3. Public access specifier
Access Specifiers Modifiers or Visibility Levels in C++ in Hindi

Private access specifier

Private access specifier के अंर्तगत declare किए गए members को केवल उसी class के functions के द्वारा ही access किया जा सकता है। ये किसी बाहरी function के access से सुरक्षित होते हैं। इसके अंतर्गत declare किया गया डेटा किसी बाहरी function से पूर्णतः छुपा हुआ व सुरक्षित रहता है।

Protected access specifier

Protected  access specifier के अंर्तगत declare किए गए members को भी बाहरी functions के द्वारा access नहीं किया जा सकता किन्तु इसके immediate derived class के function इन्हें access कर सकते हैं। इसमें डेटा private से कम किन्तु public से अधिक छुपा हुआ रहता है।

Public access specifier

Public access specifier के अंर्तगत declare किए गए members को किसी भी बाहरी class के functions के द्वारा access किया जा सकता हैं। इसलिए इसमें सामान्यतः functions को ही declare किया जाता है तथा data को private एवं protected में declare किया जाता हैं। इसमें डेटा बाहरी functions से छुपा हुआ नहीं रहता है।

Object Oriented Programmings (OOPs) के विभिन्न Concepts को जानने के लिए देखिए हमारा यह पोस्ट—Concepts of OOP

Share it to:

Computer Number System notes in Hindi

Introduction to Decimal, Binary, Octal and Hexadecimal Number Systems in Hindi

कम्प्यूटर में एंट्री किए जाने वाले संख्यात्मक डेटा (Numerical Data) को दर्शाने व उस पर प्रोसेसिंग करने के लिए नम्बर सिस्टम का प्रयोग किया जाता है। संख्यात्मक डेटा के अंतर्गत टेस्ट के प्राप्तांक, रूपए-पैसे आदि आते है। हम संख्यात्मक डेटा पर गणना के लिए Decimal Number System का प्रयोग करते हैं किन्तु कम्प्यूटर Binary Number System में कार्य करता है। इसलिए कम्प्यूटर हमारे द्वारा एंट्री किए गए सभी संख्यात्मक डेटा को पहले बाईनरी में परिवर्तित करता है फिर अपने मेमोरी में स्टोर कर उस पर प्रोसेसिंग करता है। मुख्यतः नम्बर सिस्टम निम्नलिखित प्रकार के होते है—

Computer Coding System क्या होता है जानने के लिए देखें यह पोस्ट—Computer Coding Systems

  1. Decimal Number System 
  2. Binary Number System 
  3. Octal Number System
  4. Hexadecimal Number System

Decimal Number System

डेसिमल नम्बर सिस्टम हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाला नम्बर सिस्टम है। इस नम्बर सिस्टम का उपयोग गणित, व्यापार आदि सभी जगह किया जाता है। इस नम्बर सिस्टम में 0 से 9 तक के कुल दस अंको का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इस नम्बर सिस्टम का आधार 10 होता है। डेसिमल नम्बर सिस्टम में संख्या का मूल्य अंको के स्थानीय मान पर निर्भर करता है तथा अंको का स्थानीय मान ईकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार आदि के क्रम में निकाला जाता है। उदाहरण के लिए डेसिमल नम्बर (4975)10 का मूल्य निम्नलिखित प्रकार से निकालते है—

अंक                          स्थानीय मान           
 5              -            5*1=5
 7              -            7*10=70
 9              -            9*100=900
 4              -            4*1000=4000
  
 अतः संख्या = 5+70+900+4000 = (4975)10 

Binary Number System

बाईनरी नम्बर सिस्टम कम्प्यूटर में उपयोग होने वाला नम्बर सिस्टम है। इस नम्बर सिस्टम का उपयोग कम्प्यूटर अपने सभी प्रकार के प्रोसेसिंग कार्यो के लिए करता है। इस नम्बर सिस्टम में 0 व 1 केवल दो अंको का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इस नम्बर सिस्टम का आधार 2 होता है। यहाँ वास्तव में 0 व 1 कम्प्यूटर के डिजिटल सर्किट में दो वोल्टेज लेवल को दर्शाते है। 0 low voltage (0 volt) तथा 1 high voltage (5 volt) को दर्शाता है। 0 को false तथा 1 को true भी कहते है। उदाहरण के लिए बाईनरी नम्बर (10011)2 का मान दशमलव संख्या पद्धति में (19)10 होगा।

आधुनिक युग में कम्प्यूटर के विभिन्न उपयोग क्या-क्या है जानने के लिए पढ़े यह पोस्ट—Applications and Uses of Computer

Introduction to Decimal Binary Octal and Hexadecimal Number Systems in Hindi

Octal Number System

Octal Number System में 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 इन आठ अंको का प्रयोग संख्याओं को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इसीलिए इस संख्या पद्धति का आधार 8 होता है। इस नम्बर सिस्टम का विकास प्रोग्रामरो के कार्य को आसान बनाने के लिए किया गया है क्योकि इसे बाईनरी के मुकाबले सरलता से समझा जा सकता है। इसका प्रयोग कई कम्प्यूटर निर्माताओं के द्वारा हार्डवेयर और साफ्टवेयर में किया जाता है। उदाहरण के लिए संख्या (3426)8 एक Octal संख्या को निरूपित करता है जिसका दशमलव पद्धति में मान (1814)10 है।

Hexadecimal Number System

किसी नम्बर सिस्टम में संख्याओं को व्यक्त करने के लिए कितने अंको की जरूरत होती है यह उस नम्बर सिस्टम में अंको की कुल संख्या पर निर्भर करता है। अर्थात् जिस नम्बर सिस्टम में जितने कम अंक होगें संख्याओं को लिखने के लिए उतने ही अधिक अंको की जरूरत पड़ेगी। उदाहरण के लिए बाईनरी नम्बर सिस्टम में संख्याओं को व्यक्त करने के लिए डेसिमल नम्बर सिस्टम के मुकाबले अधिक अंको की जरूरत पड़ती है। इसके साथ ही बाईनरी सिस्टम को समझना थोड़ा कठीन भी होता है। अतः संख्याओं को लिखने के लिए एक और सिस्टम Hexadecimal का प्रयोग किया जाता है। Hexadecimal में संख्याओं को प्रदर्शित करने के लिए 0 से 9 तक के अंको तथा A से F तक के अक्षरों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इसमें कुल सोलह अंक होते है इसलिए इसका आधार 16 होता है। उदाहरण के लिए संख्या (5C7F)16 एक Hexadecimal संख्या को निरूपित करता है जिसका दशमलव पद्धति में मान (23679)10 है।

I-Facts (Interesting facts about Numbers Systems)

  1. Number systems को बड़े अर्थो में दो प्रकारो में विभाजित किया जाता है—Positional Number System और Non-Positional Number System
  2. Decimal, Binary, Octal और Hexadecimal ये सभी Positional Number System के अंतर्गत आते है जिसमें अंको का मूल्य उनके Position पर निर्भर करता है।
  3. Non-Positional Number System में संख्याओं को दर्शाने के लिए अंको का प्रयोग नहीं किया जाता है। इसमें एक ही चित्र या आकृति को दोहराकर अंको को निरूपित किया जाता है। इसका प्रयोग बच्चो को गिनती सीखाने के लिए किया जाता है।
  4. ऐसा कहा जाता है कि Binary Number System का विकास जर्मन गणितज्ञ Gottfried Wilhelm Leibniz ने किया था।
  5. कम्प्यूटर में Port क्या होता है और यह कितने प्रकार का होता है जानने के लिए देखें—Computer Ports and Connectors
Share it to: